सरायकेला-खरसावां जिले में भीषण जल संकट की आशंका है। ग्राउंड वाटर का स्तर 600 फीट से नीचे चला गया है, और कई गांवों में चापाकल और कुएं सूख गए हैं। मरम्मत के अभाव में हजारों चापाकल और जल मीनार बेकार पड़े हैं, जिससे लोगों को पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसना पड़ सकता है।
जागरण संवाददाता, सरायकेला। जिले में इस गर्मी में गंभीर जल संकट के आसार दिख रहे हैं। अप्रैल महीने से ही जिले में जल संकट की भयावह तस्वीर उभरने लगी है। अभी से ग्राउंड वाटर लेबल छह सौ फीट से नीचे गिर गया है। जिले के करीब 85 गांव ऐसे हैं जहां ग्राउंड वाटर लेबल 350-400 फीट से नीचे व दस गांव में 600 -700 फीट नीचे चला गया है। ग्राउंड वाटर का लेबल औसतन 50-70 फीट पर होता है। कुचाई प्रखंड के रोलाहातु, गोमियाडीह आदि क्षेत्रों की स्थिति ग्राउंड वाटर के मामले में काफी चिंताजनक है। यहां 600 से 700 फीट नीचे पानी चला गया है। यही हाल सरायकेला के पहा़ड़पुर, पाठनमारा, कोपी, महुलडिया व गम्हरिया के डुडरा की है। यहां का ग्राउंड वाटर लेबल भी 350-400 फीट नीचे चला गया है। दर्जनों गांव में पानी का लेबल 400 फीट से नीचे कुकड़ू, खरसावां, ईचाग़ढ़, गम्हरिया, नीमडीह के दर्जनों गांव में पानी का लेबल 400 फीट से नीचे चला गया है। भू जल स्तर 400 से 600 फीट नीचे चले जाने के कारण चापाकल व कुएं सूख गए हैं। काफी मशक्कत के बाद भी एक बूंद पानी नहीं निकलता है। अगर यही हाल भू जल स्तर का रहा तो आने वाले दिनों में जिलेवासियों को पानी की एक एक बूंद के लिए तरसना पड़ेगा। जिले में बेकार पड़े करीब एक हजार से अधिक चापाकल सरायकेला खरसावां जिले में एक तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। वहीं जिले भर में करीब एक हजार से अधिक चापाकल मरम्मत के अभाव में बेकार हो गए है। इसका उपयोग ही नहीं हो पा रहा है। इसके साथ ही जल मीनार की भी यही स्थिति है। राजनगर, कुचाई आदि क्षेत्रों के जल मीनार भी मरम्मत के अभाव में बेकार हो गए हैं। सारंगपोसी गांव में मात्र तीन ही सरकारी चापाकल है। जिसमें से एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय का है। दूसरा नीचे टोला में जबकि तीसरा जाहेरथान में है। गांव की आबादी लगभग छह से सात सौ होगी। वहीं डूंगरीटोला में लगभग 30 घरों में दो से ढाई सौ की आबादी रहती है। परंतु एक भी चापाकल नहीं है। जिले में 16,283 चापाकल लगाए गए जिले में विभाग की ओर से कुल 16283 चापाकल लगाए गए हैं। जिनमें मरम्मत के अभाव में एक हजार तो खराब ही है। इसके साथ ही जिले में करीब 250 जल मीनार का निर्माण कराया गया है। इसमें भी दर्जन भर खराब पड़े हैं। एक नए चापाकल को लगाने में विभाग को 70-75 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि इसकी मरम्मत में तीन से 12 हजार रुपये तक खर्च आता है। हालांकि जिले में सरायकेला, राजनगर, कुचाई, चांडिल, कुकड़ू टेन्टोपोसी जलापूर्ति योजना का संचालन हो रहा है। लेकिन इन जलापूर्ति योजना के तहत वैसे क्षेत्रों में पानी की सप्लाई पहुंच ही नहीं पाती है जो क्षेत्र ऊंचाई के साथ साथ दूरी में है। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का नहीं है जिले में ख्याल जिले में निजी भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का ख्याल नहीं रखा गया है। इन घरों से जो भी बेकार पानी हो या वर्षा का पानी हो। वह नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है। इसी वजह से ग्राउंड वाटर लेबल सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। जिले के नया अनुमंडल कार्यालय ,कस्तूरबा विद्यालय, उकरी विद्यालय , मोनाटांड सहित कई सरकारी स्कूलों व भवनों में रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया गया है। जिले के कई ऐसे गांव हैं जहां का ग्राउंड वाटर लेबल पांच सौ फीट से नीचे चला गया है। लोगों को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अपने घरों में लगाना चाहिए, ताकि पानी की एक एक बूंद को सहेजा जा सके।- ललित इदवार, कार्यपालक अभियंता, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग.
जागरण संवाददाता, सरायकेला। जिले में इस गर्मी में गंभीर जल संकट के आसार दिख रहे हैं। अप्रैल महीने से ही जिले में जल संकट की भयावह तस्वीर उभरने लगी है। अभी से ग्राउंड वाटर लेबल छह सौ फीट से नीचे गिर गया है। जिले के करीब 85 गांव ऐसे हैं जहां ग्राउंड वाटर लेबल 350-400 फीट से नीचे व दस गांव में 600 -700 फीट नीचे चला गया है। ग्राउंड वाटर का लेबल औसतन 50-70 फीट पर होता है। कुचाई प्रखंड के रोलाहातु, गोमियाडीह आदि क्षेत्रों की स्थिति ग्राउंड वाटर के मामले में काफी चिंताजनक है। यहां 600 से 700 फीट नीचे पानी चला गया है। यही हाल सरायकेला के पहा़ड़पुर, पाठनमारा, कोपी, महुलडिया व गम्हरिया के डुडरा की है। यहां का ग्राउंड वाटर लेबल भी 350-400 फीट नीचे चला गया है। दर्जनों गांव में पानी का लेबल 400 फीट से नीचे कुकड़ू, खरसावां, ईचाग़ढ़, गम्हरिया, नीमडीह के दर्जनों गांव में पानी का लेबल 400 फीट से नीचे चला गया है। भू जल स्तर 400 से 600 फीट नीचे चले जाने के कारण चापाकल व कुएं सूख गए हैं। काफी मशक्कत के बाद भी एक बूंद पानी नहीं निकलता है। अगर यही हाल भू जल स्तर का रहा तो आने वाले दिनों में जिलेवासियों को पानी की एक एक बूंद के लिए तरसना पड़ेगा। जिले में बेकार पड़े करीब एक हजार से अधिक चापाकल सरायकेला खरसावां जिले में एक तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। वहीं जिले भर में करीब एक हजार से अधिक चापाकल मरम्मत के अभाव में बेकार हो गए है। इसका उपयोग ही नहीं हो पा रहा है। इसके साथ ही जल मीनार की भी यही स्थिति है। राजनगर, कुचाई आदि क्षेत्रों के जल मीनार भी मरम्मत के अभाव में बेकार हो गए हैं। सारंगपोसी गांव में मात्र तीन ही सरकारी चापाकल है। जिसमें से एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय का है। दूसरा नीचे टोला में जबकि तीसरा जाहेरथान में है। गांव की आबादी लगभग छह से सात सौ होगी। वहीं डूंगरीटोला में लगभग 30 घरों में दो से ढाई सौ की आबादी रहती है। परंतु एक भी चापाकल नहीं है। जिले में 16,283 चापाकल लगाए गए जिले में विभाग की ओर से कुल 16283 चापाकल लगाए गए हैं। जिनमें मरम्मत के अभाव में एक हजार तो खराब ही है। इसके साथ ही जिले में करीब 250 जल मीनार का निर्माण कराया गया है। इसमें भी दर्जन भर खराब पड़े हैं। एक नए चापाकल को लगाने में विभाग को 70-75 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि इसकी मरम्मत में तीन से 12 हजार रुपये तक खर्च आता है। हालांकि जिले में सरायकेला, राजनगर, कुचाई, चांडिल, कुकड़ू टेन्टोपोसी जलापूर्ति योजना का संचालन हो रहा है। लेकिन इन जलापूर्ति योजना के तहत वैसे क्षेत्रों में पानी की सप्लाई पहुंच ही नहीं पाती है जो क्षेत्र ऊंचाई के साथ साथ दूरी में है। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का नहीं है जिले में ख्याल जिले में निजी भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का ख्याल नहीं रखा गया है। इन घरों से जो भी बेकार पानी हो या वर्षा का पानी हो। वह नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है। इसी वजह से ग्राउंड वाटर लेबल सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। जिले के नया अनुमंडल कार्यालय ,कस्तूरबा विद्यालय, उकरी विद्यालय , मोनाटांड सहित कई सरकारी स्कूलों व भवनों में रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया गया है। जिले के कई ऐसे गांव हैं जहां का ग्राउंड वाटर लेबल पांच सौ फीट से नीचे चला गया है। लोगों को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अपने घरों में लगाना चाहिए, ताकि पानी की एक एक बूंद को सहेजा जा सके।- ललित इदवार, कार्यपालक अभियंता, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग
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