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Expaliner: बॉलीवुड में क्यों बढ़ता जा रहा Sequels और Remakes का ट्रेंड? जानिए इसके पीछे की वजह

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Expaliner: बॉलीवुड में क्यों बढ़ता जा रहा Sequels और Remakes का ट्रेंड? जानिए इसके पीछे की वजह
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मनोरंजन | बॉलीवुड: Sequels and Remakes Trend in Bollywood: बॉलीवुड इंडस्ट्री में फिल्मों के सीक्वल और रीमेक का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. चलिए जानते हैं, इसके पीछे की वजह.

Expaliner: बॉलीवुड में क्यों बढ़ता जा रहा Sequels और Remakes का ट्रेंड? जानिए इसके पीछे की वजह Sequels and Remakes Trend in Bollywood: बॉलीवुड इंडस्ट्री में फिल्मों के सीक्वल और रीमेक का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है.

चलिए जानते हैं, इसके पीछे की वजह. Sequels and Remakes Trend in Bollywood: बॉलीवुड इंडस्ट्री में फिल्मों के सीक्वल और रीमेक का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. चलिए जानते हैं, इसके पीछे की वजह. पिछले 100 सालों में देखा जाए तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की काया पलट गई है.

इसके साथ ही कई नए ट्रेंड आ गए हैं. इन्हीं में से एक ट्रेंड है फिल्मों के सीक्वल और रीमेक का, जो पिछले कुछ सालों से देखा जाए तो बढ़ता ही जा रहा है. नई और ओरिजिनल कहानियों की तुलना में सीक्वल और रीमेक बढ़ रहा है. कभी किसी हिट फिल्म का दूसरा या तीसरा पार्ट आ जाता है, तो कभी किसी पुरानी हिंदी, साउथ फिल्म या हॉलीवुड फिल्म को नए अंदाज में बनाया जाता है.

ऐसे में दर्शकों के बीच अक्सर ये सवाल उठता है कि आखिर बॉलीवुड में सीक्वल और रीमेक का ट्रेंड इतना तेजी से क्यों बढ़ रहा है? क्या इंडस्ट्री में नई कहानियों की कमी हो गई है, या इसके पीछे कोई बड़ा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है? ये सिर्फ मनोरंजन का नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के निवेश और जोखिम से जुड़ा मामला है.

तो आइए समझते हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री में सीक्वल और रीमेक के ट्रेंड से क्या प्रभाव पड़ रहा है और फ्यूचर में ये ट्रेंड किस दिशा में जा सकता है. आखिर सीक्वल और रीमेक होते क्या हैं, सबसे पहले दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है. सीक्वल की बात करे तो ये वो फिल्म होती है, जो किसी पहले से सफल फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाती है. यानि किसी फिल्म का पार्ट-2, पार्ट-3 या पूरी फ्रेंचाइजी.

जैसे फिल्म गोलमाल, भूल भुलैया, सिंघम और बाहुबली है. वहीं रीमेक किसी पहले से बनी फिल्म को नए कलाकारों, नए समय और नए अंदाज के साथ दोबारा बनाना होता है. इसमें कुछ ऐसी फिल्में भी होती है, जिन्हें अलग भाषा में दोबारा बनाया जाता है. Expaliner: AI का खतरनाक चेहरा?

सेलेब्स ही नहीं, आप भी हो सकते हैं शिकार, जानें क्या है डीपफेक और कैसे करें बचाव हालांकि बॉलीवुड में सीक्वल और रीमेक का इतिहास नया नहीं है. जी हां, जब से हिंदी सिनेमा की शुरूआत हुई है तभी से फिल्मों के रीमेक और सीक्वल की परछाई दिखाई पड़ती है. 1913 में दादा साहब फाल्के की फिल्म 'राजा हरिशचंद्र' थी.

इस फिल्म को लेकर कुछ फिल्म इतिहासकारों का विश्वास है कि 1917 में इस फिल्म का इसी नाम से रीमेक बनाया गया था. 1928 में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास‘ पर पहली बार फिल्म बनी थी. इसके बाद 1935, 1955 और 2002 में ये फिल्म कई बार बनी. ऐसे कई फिल्मों के रीमेक और सीक्वल है. लेकिन पिछले एक दशक में ये काफी तेजी से बढ़ रहा है.

डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में फिल्म निर्माण का खर्च बढ़ गया है. बड़े बजट की फिल्मों में सैकड़ों करोड़ रुपये दांव पर लग जाते हैं. ऐसे में निर्माता ऐसी परियोजनाओं को इंपॉर्टेंस देते हैं जिनकी सफलता की संभावना पहले से ज्यादा होती है और यहीं से सीक्वल और रीमेक का महत्व बढ़ने लगा है.

बता दें कि, फिल्म निर्माण करना एक जोखिम उठाने जैसा है, ऐसे में जब कोई निर्माता पूरी तरह नई कहानी पर पैसा लगाता है, तो उसे यह नहीं पता होता कि दर्शक उसे पसंद करेंगे या नहीं. लेकिन अगर फिल्म किसी पहले से लोकप्रिय ब्रांड से जुड़ी है, तो उसके पास पहले से मौजूद दर्शक होते हैं. वहीं, आज के दौर में फिल्में केवल कहानियां नहीं बल्कि ब्रांड बन चुकी हैं.

एक सफल फिल्म का नाम अपने आप में मार्केटिंग का काम करता है. अगर किसी फिल्म की फ्रेंचाइजी पहले से फेमस होती है, तो उसके अगले पार्ट को प्रमोट करने में कम मेहनत लगती है. इसके अलावा ये भी कहा जा सकता है कि बॉक्स ऑफिस के बढ़ते दबाव के चलते भी मेकर्स आजकल नई कहानी पर पैसा लगाने से डर रहे हैं. क्योंकि एक बड़ी फिल्म में निर्माण, मार्केटिंगपर भारी रकम खर्च होती है.

ऐसे में निर्माता सुरक्षित विकल्प को ढूंढते हैं. सीक्वल और रीमेक मेकर्स को ये भरोसा देते हैं कि कम से कम शुरुआती दिनों में दर्शकों का ध्यान जरूर मिलेगा. भले ही ये नेगेटिव क्यों ना हो, लेकिम मार्केट में इसकी चर्चा हो जाती है. वहीं, इसकी एक वजह OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी है.

OTTआने के बाद दर्शकों के पास कंटेंट की भरमार हो गई है. ऐसे में अब लोगों के पास फिल्मों और वेब सीरीज के हजारों विकल्प मौजूद हैं. ऐसे में किसी लोकप्रिय फिल्म का नाम दर्शकों को आकर्षित करता है. इसके अलावा जब किसी फेमस पुरानी फिल्म का रीमेक या सीक्वल आता है, तो दर्शकों को अपने पुरानी फिल्म याद करने लगते हैं.

ऐसे में निर्माता इसी भावना का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. Explainer: क्या आप भी Film और Movie को एक ही समझने की कर रहे हैं गलती? तो यहां जान लीजिए दोनों के बीच का फर्क हाल ही में देखा जाए तो साउछ इंडियन फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता मिली है. इसके बाद से ही बॉलीवुड में साउथ फिल्मों के रीमेक बनने लगे.

इतना ही नहीं, अब फिल्में कई भाषाओं में भी रिलीज होने लगी है. दरअसल, मेकर्स को लगता है कि अगर कोई कहानी एक क्षेत्र में सफल रही है, तो उसे नए दर्शकों के लिए दोबारा पेश करना आसान हो जाता है. हालांकि ये रणनीति हमेशा सफल रहे, ऐसा कहा नहीं जा सकता हैं. जी हां, ये भी एक हद तक कह सकते हैं कि अब दर्शकों रीमेक और सीक्वल फिल्में देख ऊब रहे है.

दरअसल, पिछले कुछ सालों से कई रीमेक और सीक्वल सफलता हासिल नहीं कर पाए है. अगर रीमेक में कुछ नया नहीं है, तो दर्शक उसे एक्सेप्ट नहीं करते. -निवेशकों का जोखिम कम होता है. -फिल्म फ्रेंचाइजी के जरिए लंबे समय तक बिजनेस किया जा सकता है.

- नई और मौलिक कहानियों को कम अवसर मिलते हैं. SEQUEL-REMAKE Photograph: विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या कहानियों की कमी नहीं बल्कि जोखिम लेने की कमी है. बॉलीवुड इंडस्ट्री में देखा जाए तो लेखक और निर्देशकों की कमी नहीं है. नई कहानियां लगातार लिखी जा रही हैं.

लेकिन बड़े बजट के निर्माता अक्सर सुरक्षित ऑपशन चुन रहे हैं. यही वजह है कि कई बार ऑरिजिनल फिल्मों को समर्थन नहीं मिल पाता. लेकिन आने वाले समय में इंडस्ट्री का सिर्फ सीक्वल और रीमेक पर निर्भर रहना फायदेमंद नहीं रहेगा. अब दर्शकों को नई और स्ट्रॉग कहानी चाहिए होती हैं.

अगर रीमेक और सीक्वल में कुछ नया दिखें तो वो चल सकता है. लेकिन पुराने नाम और वहीं कहानी का चलना आसान नहीं है. फिल्मों के सीक्वल और रीमेक को लेकर ये कह सकते हैं कि बॉलीवुड के सामने आने वाले समय में कई बड़ी चुनौती आने वाली है. आज का दर्शक पहले से ज्यादा समझदार है और वो सिर्फ पुराने नाम के आधार पर फिल्में नहीं देखेगा.

ऐसे में मेकर्स को कुछ नया लाने की कोशिश करनी चाहिए. वहीं, अगर रीमेक और सीक्वल आता भी है तो उनकी कहानी और अंदाज सब नया होना चाहिए. - नहीं, सिर्फ हिट नाम होने से सफलता नहीं मिलती, कंटेंट भी मजबूत होना चाहिए. -क्योंकि सीक्वल में पहले से बनी फैन फॉलोइंग और ब्रांड वैल्यू का फायदा मिलता है.

- OTT के बढ़ते मुकाबले में मेकर्स पहचान वाली फिल्मों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं. -क्योंकि कई साउथ फिल्में बड़े स्तर पर सफल रहीं, जिससे उनकी कहानियों पर भरोसा बढ़ा. बॉक्स ऑफिस का नया खेल, आखिर क्यों फिल्मों को बचाने के लिए देना पड़ रहा है ‘Buy 1 Get 1 Free’ ऑफर? विस्तार से जानिए

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