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देश में जल प्रदूषण बड़ी समस्या, किस कानून से लगेगी लगाम..क्या हैं प्रावधान और सजा

Water Pollution Act 1974 News

देश में जल प्रदूषण बड़ी समस्या, किस कानून से लगेगी लगाम..क्या हैं प्रावधान और सजा
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The Water Bill & Water Pollution: देश में हुए औद्योगिक विकास का भी, बढ़ते नदी-जल प्रदूषण के सिलसिले में बड़ा हाथ है। जल-प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए भारत में सशक्त कानून मौजूद हैं।

The Water Bill & Water Pollution: देश में हुए औद्योगिक विकास का भी, बढ़ते नदी-जल प्रदूषण के सिलसिले में बड़ा हाथ है। जल-प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए भारत में सशक्त कानून मौजूद हैं।देश में जल प्रदूषण एक बड़ी समस्या है।कई जगहों पर गंगा और यमुना जैसी नदियों का पानी, पीने लायक तो दूर नहाने लायक भी नहीं है। सरकारें नदियों को साफ करने के लिए करोड़ों रुपयों की योजनाएं लागू करती हैं..

लेकिन उसका कोई खास फायदा नहीं दिखता है। देश में तेजी से हुए औद्योगिक विकास का भी, बढ़ते नदी-जल प्रदूषण के सिलसिले में बड़ा हाथ रहा है। जल-प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए भारत में सशक्त कानून मौजूद है। जिसकेकागज नहीं दिखाएंगे गैंग को कितना बड़ा झटका?

सुप्रीम कोर्ट Judgement ने कैसे किया SIR के 'महाभारत' का अंतइसका मुख्य उद्देश्य नदियों, झीलों, भूजल आदि जल स्रोतों की गुणवत्ता बनाए रखना और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर नियंत्रण करना है। यह कानून उद्योगों, फैक्ट्रियों और अन्य संस्थानों पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वे पानी को प्रदूषित न करें।यदि कोई उद्योग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ जुर्माना, फैक्ट्री बंद करने का आदेश और जेल तक की कार्रवाई हो सकती है। वैसे तो ये कानून साल 1974 से ही अमल में हैं। परंतु फिर भी यह देखा गया कि जल-प्रदूषण का स्तर घटा नहीं बढ़ता ही गया है। कई बार देश में नदी-सफाई की कई योजनाएं भी चलाईं गईं, लेकिन जल-प्रदूषण की समस्या जस की तस बनी रही।साल 2024 में देश की बदली हुई जरुरतों और पुराने प्रावधानों को जल-प्रदूषण रोकने में कम मानते हुए Water Amendment Act , 2024 आया इसके तहत नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने की नई व्यवस्था लागू की गई । अब उल्लंघन पर लगभग ₹10,000 से ₹15 लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है। नए प्रावधानों के तहत अब कई मामलों में अदालत की जगह नियुक्त अधिकारी दंड तय करेंगे। फिर उनके फैसले के खिलाफ National Green Tribunal में अपील किए जाने की व्यवस्था रखी गई है। इन सुधारों को सरकार ने सबसे पहले कुछ चुनिंदा राज्यों में लागू किया गया। मसलन...

हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और सभी केंद्र शासित प्रदेशों में इसे लागू किया गया। इस सुधारों में एक सबसे बड़ी बात यह रही कि छोटी-छोटी बातों के लिए ..

जेल की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया। परंतु कई मामलों में जुर्माने और दंड के प्रावधान कड़े कर दिए गए। ऐसे अपराध जिनके लिए स्पष्ट रूप से दंड निर्दिष्ट नहीं है, तीन महीने तक के कारावास या 10,000 रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडनीय हैं। विधेयक कारावास को दंड के रूप में हटाता है और 10,000 रुपये से 15 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान करता है। अधिनियम के किसी भी प्रावधान के उल्लंघन के लिए जुर्माना न भरने पर तीन वर्ष तक का कारावास या जुर्माने की राशि के दोगुने तक का जुर्माना हो सकता है।भारत में कोई भी उद्योग बिना अनुमति के जहरीला या गंदा पानी नदी, झील, नाले या जमीन में नहीं छोड़ सकता। इसके लिए संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेना जरूरी होता है। यदि कोई औद्योगिक संस्थान बगैर ट्रीटमेंट किए केमिकल वाला पानी नदी-जल या तालाब में छोड़ती है, तो यह कानून का उल्लंघन माना जाता है। ऐसे कई मामलों में अदालतों ने सख्त ऐक्शन लेते हुए, ऐसी औद्योगिक संस्थानों पर भारी जुर्माना लगाया है। Twisha Sharma Case: मामले से समझिए..

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क्या है लीगल एंगलकई छोटी फैक्ट्रियां नियमों का पालन नहीं करतीं और चोरी-छिपे गंदा पानी छोड़ देती हैं।और पर्यावरण एजेंसियां लगातार कड़ा एक्शन कर रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कानून काफी नहीं है। उद्योगों, सरकार और आम लोगों तीनों को एक साथ मिलकर काम को सफल बनाना होगा। क्योंकि यदि नदियां और भूजल पीने लायक न रहे, प्रदूषण का शिकार बन गए, तो इसका बड़ी असर हमारी आने वाली पीढ़ियों तक देखा जाएगा। साफ पानी केवल साफका ही मुद्दा नहीं, बल्कि हम सभी लोगों के स्वास्थ्य और जिंदगी का सवाल है। शायद, इसीलिए रहीम कवि पहले ही कह गए हैं....

मनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखनकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद

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